Thursday, January 15, 2015

अकविता (10) - वक्तृता अथवा अंग्रेजी भाषा ?

क्या अंग्रेजों के ऊपर भी
एक अंग्रेजी की वक्तृता
मुझ जैसे
अंग्रेजी न जानने वाले हिन्दुस्तानी की तरह ही
कुछ भी न समझ आने के बावजूद भी
वशीभूत कर डालने वाला प्रभाव डालती है ?
इसी प्रकार की
अन्य किसी भाषा की वक्तृता भी
जिसकी भाषा भी मुझे नहीं आती
क्या अंग्रेजी की तरह ही प्रभाव डालती है ?
ठीक ऐसी ही वक्तृता
जो मेरी ही भाषा में हो
और जो मुझे समझ में भी आती हो
क्या अंग्रेजी की तरह ही मुझ पर प्रभाव डालती है ?
महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि
महत्वपूर्ण क्या है ?
वक्तृता अथवा अंग्रेजी भाषा ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

12 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

सार्थक प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (17-01-2015) को "सत्तर साला राजनीति के दंश" (चर्चा - 1861)7 पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! मयंक जी !

Onkar said...

सटीक व सार्थक सामयिक प्रस्तुति

Kavita Rawat said...

सुन्दर प्रस्तुति

dr.mahendrag said...

सही प्रश्न हैआप का ,पर वक्ता के विचार ही महत्वपूर्ण है न कि भाषा और वक्ता

Pratibha Verma said...

सार्थक प्रस्तुति...

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! Onkar जी !

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! Kavita Rawat जी !

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! dr.mahendrag जी !

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! Pratibha Verma जी !

संजय भास्‍कर said...

सार्थक सामयिक प्रस्तुति

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! संजय भास्कर जी !

मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...