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Showing posts from January, 2015

*मुक्त-मुक्तक : 666 - हो गया इक दिन नशा.....

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खुल के या छुप के जनाब अच्छा नहीं ॥ ताकना उनका शबाब अच्छा नहीं ॥ हो गया इक दिन नशा भूले मगर , रोज़ ही पीना शराब अच्छा नहीं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 665 - मेरी इक तरफ़ा.......

जिसने दुनिया मेरी बनाई थी ॥ ज़िंदगानी मेरी सजाई थी ॥ मेरी मेहनत न वो मेरी क़िस्मत , मेरी इक तरफ़ा आश्नाई थी ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*हाइकु-माला (1)

*हाइकु-माला (1) ============ तन से काली ॥ पर हिय से वह - शुभ्र दिवाली ॥ ============ मेरी मंज़िल ॥ ग़ैर मुमकिन सा – आपका दिल ॥ ============ अति नव्य है ॥ सच ही घर तेरा – अति भव्य है ॥ ============ आ जा सजलें ॥ दुख से बचकर – थोड़ा नचलें ॥ ============ थक रहा हूँ ॥ पल दो पल भर – रुक रहा हूँ ॥ ============ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत (19) - सुख के कारागार से कर दो मुक्त मुझे

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हाँ अपने अपराध मुझे स्वीकार्य सभी , ऐसा दण्ड दो हो पापों का क्षय जिससे ॥ सुख के कारागार से कर दो मुक्त मुझे । लौह-श्रंखला भार से कर दो युक्त मुझे । नख उखाड़ो, कीलें ठोंको, दागो, पीटो और हँसो भीषण पीड़ा दे उक्त मुझे । ताकि करूँ ना फिर से ऐसा कार्य कभी , हो स्वतन्त्रता छिन जाने का भय जिससे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत (18) - तुझको पुस्तक सा पढ़ा है रे

क्यों तेरी अनुपम छटा का आर्य , चित्र आँखों में मढ़ा है रे ? जैसे कोई भक्त रामायण । सह-हृदय करता है पारायण । पाठ्यक्रम की मैंने इक अनिवार्य तुझको पुस्तक सा पढ़ा है रे ॥ कोसता हूँ क्यों सतत वह क्षण ? जब हुआ तुझ पर हृदय अर्पण । प्रेम मेरा तुझको अस्वीकार्य – पर तेरा मुझ सिर चढ़ा है रे ॥ ढाल का सुंदर मेरी कण-कण । तू ही करता था मेरा यों पण । क्यों हुआ अब मैं तुझे परिहार्य ? तूने ख़ुद मुझको गढ़ा है रे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

अकविता (14) - सतत अनुसंधान ,शोध ,खोज ,तलाश

अभी तो हम चेतन हैं । यदि पहले से ही हमें पता हो हमारी मौत का दिन । हमें पता हो कब होने वाला है हमारा अपमान ? हम जिस परीक्षा में बैठने वाले हैं उसमें क्या पूछा जाने वाला है ? क्या चल रहा है दूसरों के मन में ? वह सब जान सकें चुटकी बजाते ही जो जो भी हम जानना चाहें । प्रश्न यह है कि – यदि यह सब संभव हो जाए तो क्या होगा ? यदि हम सब यह मान बैठें या सचमुच ही यही सच होता भी हो कि - जब जब जो जो होता है तब तब वो वो ही होता ही है । तो फिर हमें  क्यों रह जाएगी कुछ भी करने की आवश्यकता ? हमें करना भी चाहिए क्यों कुछ ? हमारे जीवन का क्या उद्देश्य होगा यदि सब कुछ पूर्व निर्धारित है तो ? क्या अज्ञात के प्रति जिज्ञासा ही जीवन का आनंद नहीं है ? संघर्ष ही गति का कारण नहीं है क्या ? लगता है हमें निरंतर चलायमान बनाए रखने का अनिवार्य कारण है - सतत अनुसंधान , शोध , खोज , तलाश ।   अन्यथा क्या हम जड़ न हो जाएंगे ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति <

राष्ट्र-प्रेम

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मात्र जिह्वा से इसका मत उच्चारण करना ॥ देश-भक्ति को सदा हृदय में धारण करना ॥ निज-हित,स्वार्थ-पूर्ति को सब ही मरते हैं तुम , राष्ट्र-प्रेम को ही मरने का कारण करना ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत (17) : बोलो अब तक किसने देखे ?

बोलो अब तक किसने देखे ? जितने सर पर केश तुम्हारे । नीलगगन में जितने तारे । स्वप्न सुनहरे लेकर तुमको - मैंने गिनकर इतने देखे ॥ गहन उदधि कभी तुंग हिमाचल । कभी अगन तुम कभी बरफ-जल । समय-समय पर रूप तुम्हारे - मैंने नाना कितने देखे ? देखे तो मैंने कई सारे । जग में न्यारे-न्यारे प्यारे । उनमें तुमसे अधिक न पाया - मैंने सुंदर जितने देखे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

अकविता (13) - मेरे काव्य-कर्म का मूल उद्देश्य

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औरों को पता नहीं क्या?
किन्तु मेरे लिए
न जाने क्यों?
किन्तु एक व्यसन है – कविता ।
लिख लेने के बाद
मुझे असीम शांति मिलती है ।
इसका दूसरा कोई पाठक नहीं होता ।
मैं स्वयं पढ-पढ़कर आत्ममुदित होता हूँ ।
और हाँ –
जो यह कहते हैं
यह फ़ालतू लोगों का
एक फ़ालतू काम है
उन्हे सूचित हो

*मुक्त-मुक्तक : 664 - शत्रु क्या दुख से....

शत्रु क्या दुख से मेरा मारा मिला ॥ जैसे जो चाहा था वह सारा मिला ॥ कम न होता था जो , उसको देखकर मुझको मेरे दुख से छुटकारा मिला ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

अकविता (12) -मुझे सब उल्टा लगता है

मैं वहाँ भी अरे जिसका नाम तक लेने से लोग डरते हैं हर्ष पूर्वक सदा सदा के लिए चलने को , बसने को तैयार हूँ क्या तो कहते हैं उसे ? हाँ ! नर्क । क्योंकि मैं जानता हूँ मेरा अनुभव है सम्पूर्ण विश्वास है मुझे सब उल्टा लगता है जैसे - तपन ठंडी , काँटे फूल , पीड़ा आनंद , जब तुम साथ होती हो । तो फिर निश्चय ही क्यों न नर्क भी स्वर्ग लगेगा ? बोलो-बोलो ! अकेले नहीं । तुम्हारे बिन भी तो सब उल्टा लगता है जैसे ठंडी तपन , फूल काँटे , आनंद पीड़ा । -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 663 - रहा हूँ उसके बहुत साथ

रहा हूँ उसके बहुत साथ मैं न कम लेकिन ॥ किए हैं उसने कई मुझपे हाँ करम लेकिन ॥ यकीं तो आए कि मेरा कभी वो था कि नहीं , करूँ तभी तो बिछड़ने का उससे ग़म लेकिन ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 662 - क्या इसलिए कि.......

क्या इसलिए कि आस्माँ से औंधा गिरा हूँ ? सब जिस्म पुर्जा-पुर्जा मगर टुक न मरा हूँ ! अपने ही आस-पास हैं मेरे मगर मुझे , क्यों लग रहा है दुश्मनों के बीच घिरा हूँ ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 661 - बेकार है , ख़राब है

बेकार है , ख़राब है , बहुत ग़लीज़ है ॥ उसके लिए है सस्ती मुफ़्त जैसी चीज़ है ॥ बेशक़ नहीं हो मेरी ख़ुशगवार ज़िंदगी , मुझको मगर बहुत बहुत बहुत अज़ीज़ है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 660 - मैं न जानूँ क़ायदा क्या है

मैं न जानूँ क़ायदा क्या है ,अदब क्या ? सीखकर भी फ़ायदा है और अब क्या ? पाँव दोनों क़ब्र में लटके न जानूँ , हादसा हो जाए मेरे साथ कब क्या ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

अकविता (11) - उसे कितना ख़्याल है

उसे कितना ख़्याल है हमारी आँखों के स्वाद का । आज मैंने जाना । जबकि उसे देखा उजाले में , दरारों से छिपकर । वह सब जो वह लादे रहती थी निर्धन होकर भी सर्वथा नकली , सस्ते ढेरों अलंकार - जो उसके चेहरे को प्रकट करने के बजाय विलुप्तप्राय करते रहते थे छटपटाकर सिर के पहाड़ की तरह पटकते हुए , फोड़े के मवाद की तरह मसकते हुए । मैंने पाया यदि वह बिना आभूषणों के हमारे सामने पड़ जाए तो उबकाई रोके न रुके यह जानकर मुझे उसकी आभूषण लादे रहने की विवशता पर जिसे मैं अब तक उसका शौक समझकर   उसका तिरस्कार करता रहा था घृणा उगलता रहा था आज असीम श्रद्धा उमड़ आई । -डॉ. हीरालाल प्रजापति