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ग़ज़ल : 176 - कुत्तों को गोश्त ताज़ा

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क्या ख़ूब अंधे-बहरे , दुनिया चला रहे हैं ? हक़दार जो सज़ा के इन्आम पा रहे हैं ॥ जलती हुई ज़मीं पर , साया न अपना करते , बादल समंदरों पे , जा-जा के छा रहे हैं ॥ है पेश तश्तरी में , कुत्तों को गोश्त ताज़ा , मुफ़्लिस उठा के जूठन , घूड़े से खा रहे हैं ॥ ये किस तरह के पहरेदारों को रख रहे हो , जो चोर-डाकुओं को , अपना बता रहे हैं ? दर पे लगा के ताला , चल देते हैं कहीं वो , गर जान जाएँ मेहमाँ , घर उनके आ रहे हैं ॥ बेखौफ़ धीरे-धीरे , कुछ दोस्त , दोस्त के ही , बैठक से सोने वाले , कमरे में जा रहे हैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 795 - थमती न थीं

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थमतीं न थीं इक ठौर पे रहतीं थीं जो चंचल ॥ नदियों सी इठलाती चला करती थीं जो कलकल ॥ क्या हो गया गहरी भरी वो झील के जैसी , आँखे वो बनकर रह गईं क्यों थार का मरुथल ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 794 - तेरा ही लालच है ॥

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सफ़ेद झूठ नहीं है ये सच निरा सच है ॥ भरा हुआ तू हृदय में मेरे खचाखच है ॥ ये बुद्धि कहती है मुझको है तू असंभव ही , करूँ क्या ? मन को तेरा बस तेरा ही लालच है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 793 - पीने से रोक लेते ?

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मर-मर के मुझको गर तुम जीने से रोक लेते ॥ सीना अड़ा के अपने सीने से रोक लेते ॥ क्यों होता बादाकश ? क्यों बेगाना होश से मैं ? पहली ही काश ! बोतल पीने से रोक लेते ? ( बादाकश=शराबी ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 175 - सवार हम रहे ॥

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उजड़े-उजड़े रहे कब बहार हम रहे ? इसलिए हम न गुल सिर्फ़ ख़ार हम रहे ॥ तुम कुम्हार हो के भी ज़र के ज़ेवर रहे , बनके माटी के लौंदे सुनार हम रहे ॥ ख़ुद पे भी एतबार अब हमें सच नहीं , इतने धोख़ाधड़ी के शिकार हम रहे ॥ मक़्बरा भी हो तो क्या है तुम ताज हो , हो के मस्जिद भी उजड़ी मज़ार हम रहे ॥ तुम हवाई जहाजों पे उड़ते चले , रात-दिन बस गधों पे सवार हम रहे ॥ तुम रहे ख़ुशनसीबी से मंज़िल सदा , अपनी कमबख़्ती से रहगुज़ार हम रहे ॥ (गुल=पुष्प ,ख़ार=काँटा ,ज़र=स्वर्ण ,ज़ेवर=आभूषण ,एतबार=विश्वास ,कमबख़्ती=दुर्भाग्य ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 174 - आरक्त द्रव माहुर है तू ॥

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मेरे प्रति निर्मम है अति निष्ठुर है तू ॥ शत्रुओं से प्रेम को आतुर है तू ॥ आदमी सा तू कभी चलता नहीं , साँप है या फिर कोई दादुर है तू ? जब पड़े तू पंखुड़ी पर दे कुचल , ओस है या साँड़नी का खुर है तू ॥ चाहता कोई न क्यों सुनना तुझे , काक-वाणी है या खर का सुर है तू ? मत स्वयं को माँग का सिंदूर कह , पाँव का आरक्त द्रव माहुर है तू ॥ हथकड़ी या पाँव की बेड़ी है रे , तू न मंगलसूत्र है नाँँ दुर है तू ॥ और सब बातों में तू कच्चा बड़ा , किन्तु अपने निर्णयों में धुर है तू ॥ ( दादुर=मेंढक ,खुर=चौपायों के पाँव के निचले भाग का खोल या नाखून ,खर=गधा ,माहुर=आलता ,दुर=नाक या कान की मोती युक्त लटकन ,धुर=पक्का ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 173 - रंगीन नहीं होगा ॥

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आकर्षण तुझ सम चुम्बक में भी न कहीं होगा ॥ तुझ सम्मुख सुंदरतम भी आसीन नहीं होगा ॥ आँखों को भाने वाले इतने तो हैं रँग तुझमें , इन्द्रधनुष तुझसे बढ़कर रंगीन नहीं होगा ॥ मीठेपन में तू मधु से मीठी ही तो निकलेगी , सागर भी तुझसे ज्यादा नमकीन नहीं होगा ॥ सीधी-सादी यौवन-गति सर्पों सी ही झूम उठे , तेरे सुर के आगे कोई बीन नहीं होगा ॥ तेरे दर्शन पा सुध-बुध भूल अपनी है कौन युवा , तेरी प्रीति में अष्ट-प्रहर लवलीन नहीं होगा ? तेरा निर्धन स्वामी भी मैं धनपति ही समझूँ , तुझसे जो वंचित उससे कोई दीन नहीं होगा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 792 - न कह उसको तू ‘तू’ ॥

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वो इक शेर है कोई हरगिज़ न आहू ॥ उसे ‘आप’ ही कह न कह उसको तू , ‘तू’ ॥ कभी मेरे क़िस्सों का किरदार था वो , मेरी शायरी का रहा है वो मौजू ॥ ( आहू=हिरण , किरदार=चरित्र ,शायरी=कविता ,मौजू=विषय )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 791 - जंगलों में परिंदे

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हाँ , जंगलों में परिंदे व जानवर देखे ॥ नदी , तलाव में मछली , बतख़ , मगर देखे ॥ जो ढूँढने को चले तेरे शह्र में इंसाँ , मिले तमाम फ़रिश्ते , न पर बशर देखे !! ( फ़रिश्ते =देवता  / बशर =इंसान ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 790 - करो तृप्त ॥

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मुझको पूरा भर दो या कर चलो रिक्त ॥ या प्यासा ही रक्खो या फिर करो तृप्त ॥ मैं अतिवादी पूर्णत्व का अभिलाषी , फीका हो मीठा तो मुझको लगे तिक्त ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 789 - दुश्मन दो मुझको

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दुश्मन दो मुझको जानी या जानी फिर बलम दो ॥ जज़्बात दिखाने कुछ खुशियाँ या कुछ अलम दो ॥ पानी पे कैसे मुमकिन कुछ भी उकेरना हो ? इक मुझको कोरा काग़ज़ ,अच्छी सी इक कलम दो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 788 - आँख लड़ी !!

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फ़िदा उसी पे होने दिल अड़ा ये जान अड़ी !! कि जिसकी फोड़ना था आँख उसी से आँख लड़ी !! हसीं के साथ ही मासूम भी इतना था अदू , बजाय सख़्त कराहत के मुहब्बत उमड़ी !! ( अदू = शत्रु ,कराहत = घृणा ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति


*मुक्त-मुक्तक : 787 - नहीं कोई मेरा अपना

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ख़ुद पे ख़ुद का दिल तहेदिल से लुटाता हूँ ॥ ख़ुद को ख़ुद के ही गले कसकर लगाता हूँ ॥ क्योंकि बनता ही नहीं कोई मेरा अपना , ख़ुद को ख़ुद का आईना तक मैं बनाता हूँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 786 - तेरे हिज़्र में

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आता नहीं तू याद फिर भी याद करूँगा ॥ आती हँसी है तब भी सिर्फ़ आह भरूँगा ॥ वादा जो कर लिया है तुझसे तेरे हिज़्र में , जब तक जिऊँगा तेरे ही लिए मैं मरूँगा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 785 - जहन्नुम

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मर्ज़ इक तो लाइलाज़ उस पर ये तुर्रा कर्क है ॥ ज़िंदगी पूरी जहन्नुम , एक रौरव नर्क है ॥ फिर भी रोके है हमें तू ज़ह्र पीने से !! ख़ुदकुशी के वास्ते इस से बड़ा क्या तर्क है ? ( कर्क=कैंसर , रौरव=एक भयानक नर्क ,तर्क=दलील ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 784 - नींद भर का ख़्वाब

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एक ही जाम में सौ ख़ुम भरी शराब दिखे ॥ एक जुगनूँ में ही दोपहरी आफ़्ताब दिखे ॥ एक मुद्दत से नहीं सोया इसलिए चाहूँ , एक झपकी में पूरी नींद भर का ख़्वाब दिखे ॥ ( जाम=प्याला , ख़ुम=मटका, आफ़्ताब=सूर्य , मुद्दत=अर्सा )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 783 - दो ख़बर ॥

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झूठ है , झूठ है , झूठ है हाँ मगर ॥ दोस्तों-दुश्मनों 
सबको कर दो ख़बर ॥ कम से कम मुंतज़िर 
मेरी मैयत के जो , उनसे कह दो कि मैं 
कल गया रात मर ॥ ( मुंतज़िर = प्रतीक्षारत , मैयत = मृत्यु ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

गीत : 40 - अलाव नहीं है ॥

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चाहे धरा पे चाहे चाँद पे या अधर पर ॥ जो चाहते हैं वह न लाके दोगे तुम अगर ॥ तुम लाख कहो तुमको हमसे प्यार है मगर , हम समझेंगे हमसे तुम्हें लगाव नहीं है ॥ सिंगारहीन हमको देखकर अगर तुम्हें – ऐसा लगे न सामने है कोई अप्सरा । सजधज के आएँ तो लगे न दिल की धड़कनें – थम सी गई हैं या तुरंत बढ़ गईं ज़रा । हम मान लेंगे हममें सुंदराई तो है पर , टुक चुम्बकत्व या तनिक खिंचाव नहीं है ॥ छू भर दें हम अगर तुम्हें तो तुमको न लगे – बहने लगी नसों में ख़ून की जगह पे आग । धर दें अधर अधर पे फिर भी तुममें रंच भी –