नवगीत ( 8 ) : ऐसी मैं कविता लिखता हूँ ॥


ऐसी मैं कविता लिखता हूँ ॥
रोष में पर्वत को तिल कहता ,
हो सुरंग तो मैं बिल कहता ,
होता हूँ जब हर्षमग्न तो –
बूँद को भी सरिता लिखता हूँ ॥
कुछ मस्तिष्क को बूझ न पड़ता ,
बिन ऐनक जब सूझ न पड़ता ,
हृष्ट-पुष्ट सम्पूर्ण पुरुष को –
क्षीणकाय वनिता लिखता हूँ ॥
मित्र मंडली में जब फँसता ,
सुध-बुध भूल-भाल तब हँसता ,
कृष्ण धनी को रंक सुदामा –
राधा को ललिता लिखता हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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