नवगीत (7) : सब चुप ! फिर मैं भी क्यों बोलूँ ?


सब चुप ! फिर मैं भी क्यों बोलूँ ?
सन्नाटे में बम फट जाये ।
गज़ भर की ज़बान कट जाये ।
कोई नहीं जब कुछ कहता है तो ,
मैं ही क्यों अपना मुँह खोलूँ ?
क्यों ऐसा चाहे जब घटता है ?
सोच रहे सभी ये सब क्या है ?
टहलते हुए सब खा पीकर ,
इक मैं ही भूखा इत-उत डोलूँ !
क्वाँरे क्यों बंजर जोत रहे ?
मुखड़ों पे डामल पोत रहे ?
पूछ रहा है पति पत्नी से ,
क्या मैं तेरी सखि के सँग सोलूँ ?
साथ समय के ये भागे है रे ।
बल्कि कहीं तो उससे आगे है रे ।
जैसा हुआ ये जग धावक है ,
मैं भी कहीं न वैसा हो लूँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (22-12-2014) को "कौन सी दस्तक" (चर्चा-1835) पर भी होगी।
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
सबकी अपनी-अपनी भाषा है
अपनी-अपनी मौज----
बोलो या ना बोलो
रहो चाहो तो मौन?
Kailash Sharma said…
कब तक चुप रहेंगे? कभी न कभी तो आवाज़ उठानी ही होगी..बहुत सुन्दर और सटीक...
धन्यवाद !मन के मनके जी !
धन्यवाद ! कालीपद ''प्रसाद''जी !

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