*मुक्त-मुक्तक : 654 - दुर्गंधयुक्त स्वेद...........


दुर्गंधयुक्त स्वेद गुलाबों का इत्र था ॥
सच थूक भी उसको मेरा लगता पवित्र था ॥
दिखती थी उसको कालिमा भी मेरी रश्मिपुंज ,
जब वो कभी मेरा अभिन्न इष्ट मित्र था ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

मुक्त-ग़ज़ल : 262 - पागल सरीखा

विवाह अभिनंदन पत्र

मुक्त-ग़ज़ल : 264 - पेचोख़म