*मुक्त-मुक्तक : 653 - पड़ा रहता है...........


पड़ा रहता है दलदल में न डूबा ना धँसा करता ॥
वो मकड़ी की तरह जालों में रहकर ना फँसा करता ॥
लतीफ़ागोई करके भी मेरी आँखें भर आती हैं ,
वो अपनी दास्ताने ग़म सुनाकर भी हँसा करता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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