*मुक्त-मुक्तक : 652 - मेरी इस बात पे.....





मेरी इस बात पे तब तब बड़ी तक़रार हो उठती है ॥ 
नहीं इक दो दफ़ा ही बल्कि कई कई बार हो उठती है ॥
नहीं हूँ मसख़रा फिर भी मुझे जब देखकर महफ़िल ,
न संजीदा हो उल्टे और क़हक़हाज़ार हो उठती है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति  




Comments

Popular posts from this blog

मुक्त-ग़ज़ल : 262 - पागल सरीखा

विवाह अभिनंदन पत्र

मुक्त-ग़ज़ल : 264 - पेचोख़म