*मुक्त-मुक्तक : 651 - बदन को फूँकता.....


बदन को फूँकता ठंडा यों ही बुख़ार करूँ ॥
चढ़े दिमाग़ के गुस्से का यों उतार करूँ ॥
क़लम ले दिल की ज़िंदगी की डायरी में बयाँ ,
मैं अपनी शायरी में अपना हर गुबार करूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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