नवगीत ( 2 ) : यद्यपि मैं ज्ञानी अपूर्व हूँ.........

यद्यपि मैं ज्ञानी अपूर्व हूँ ॥
वो समझें मैं वज्र मूर्ख हूँ ॥
मेरा बगुला-भगत से नाता ,
हर सियार मेरा लघु भ्राता ,
कथरी ओढ़ के पीता हूँ घी ,
एड़ा बनकर पेड़ा खाता ,
मैं जानूँ कितना मैं धूर्त हूँ  ?
चक्षु खुले हैं किन्तु सुप्त मैं ,
वो ये सोचें स्वप्नलुप्त मैं ,
मैं ही जानूँ कहाँ प्रकट हूँ ?
मैं ही जानूँ कहाँ गुप्त हूँ ?
मैं विचित्र अदृष्ट मूर्त हूँ ॥
लकवा पीड़ित वाम हस्त है ,
पग दायाँ पोलियो ग्रस्त है ,
आँख मोतियाबिंद समर्पित ,
बहरेपन से कर्ण त्रस्त है ,
अर्ध काय पर हृदय पूर्ण हूँ ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Shiv Raj Sharma said…
वाह वाह वाह अति उत्तम सर
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (07-12-2014) को "6 दिसंबर का महत्व..भूल जाना अच्छा है" (चर्चा-1820) पर भी होगी।
--
सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद ! Shiv Raj Sharma जी !

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