156 : मुक्त-ग़ज़ल - ख़त हमसे तुमको यों तो......


ख़त हमसे तुमको यों तो लिक्खे गये तमाम ॥
लेकिन न डाकिया ना कभी मिल सका हमाम ॥
दिल क्या है जान भी ये लिख दी है तेरे नाम ,
दिखलाएंगे किसी दिन गर आएगा मक़ाम ॥
ताउम्र तेरे ख़त की लूँगा निहार राह ,
मत भेजना मगर तू इन्कार का पयाम ॥
मेरी दुकाँ के कुछ यूँ वो हैं ख़रीददार ,
ना मुफ़्त में ही लें कुछ ना देते पूरे दाम ॥
कहते हैं वो जो करते हैं हम ख़ुशी से फ़ौर ,
लेकिन न मान लेना उनके हैं हम ग़ुलाम ॥
आगोश में जो बैठे बाहों में ख़ूब सोए ,
मतलब निकल गया तो लेते नहीं सलाम ॥
भूले से पड़ गयी थी तुम पर नज़र क्या यार ,
अब तुमको देखने का है आख़री मराम ॥
तन्हाइयों में अक्सर लेकर तेरा ख़याल ,
करते हैं आप ही से हम आप ही क़लाम ॥
( हमाम=कबूतर ,मक़ाम=अवसर , फ़ौर=तुरंत , आख़री मराम=अंतिम इच्छा , क़लाम=बातचीत )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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