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Thursday, December 25, 2014

नवगीत (10) : फिर गये जब घूर के दिन ॥


फिर गये जब घूर के दिन ॥
चापने उसको लगे सब ।
चाटने उसको लगे सब ।
पास में आने से जिसके –
कल तक आती थी जिन्हें घिन ॥
आँख का तारा हुआ है ।
सब का ही प्यारा हुआ है ।
जो न फूटी आँख भाया –
था किसी को एक भी छिन ॥
भाग्य फूटा जग गया है ।
जैकपॉट इक लग गया है ।
भीख न मिलती थी जिसको –
दान दे अब नोट गिन-गिन ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

4 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सार्थक प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (27-12-2014) को "वास्तविक भारत 'रत्नों' की पहचान जरुरी" (चर्चा अंक-1840) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! मयंक जी !

Kavita Rawat said...

समय की बात रहती है ..

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! Kavita Rawat जी !