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Showing posts from December, 2014

पूर्ण सहर्ष करें मन से तेरा स्वागत नववर्ष ॥

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पाताली-घनघोरपतनयागगनचुंबी उत्कर्ष॥ चाहेअपनेसँगतू लायेशान्तियाकि संघर्ष॥ किन्तु सभीउत्थानाशान्वित-सुखाभिलाषी हम, पूर्णसहर्षकरेंमनसेतेरास्वागतनववर्ष ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 655 - सुंदरता को द्विगुणित करके......

सुंदरता को द्विगुणित करके अलंकरण से ॥ चलती जब वह हौले-हौले कमल चरण से ॥ मरता यदि सान्निध्य को उसके अति कायर भी , फिर उसको पाने वो डरता नहीं मरण से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत (13) : उस कोमल में अति दृढ़ता है ॥

उस कोमल में अति दृढ़ता है ॥ जीवन के प्रति इक उत्कटता । है उसमें अद्भुत जीवटता । नीलगगन के स्वप्न लिए वो - बिन सीढ़ी ऊपर चढ़ता है ॥ उसका हाथ न कोई पकड़ता । स्वयं ही गिर फिर उठ चल पड़ता । उसका लक्ष्य थकाने वाला – अतः वो रुक-रुक कर बढ़ता है ॥ अर्थहीन संवाद न करता । व्यर्थ वाद-प्रतिवाद न करता । अपनी गलती झुक स्वीकारे – दोष न औरों पर मढ़ता है ॥ धरती पर ही स्वर्ग-नर्क हैं । उसपे इसके ढेर तर्क हैं । सारे नर्क मिटाकर अपने – उन पर स्वर्ग नये गढ़ता है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 654 - दुर्गंधयुक्त स्वेद...........

दुर्गंधयुक्त स्वेद गुलाबों का इत्र था ॥ सच थूक भी उसको मेरा लगता पवित्र था ॥ दिखती थी उसको कालिमा भी मेरी रश्मिपुंज , जब वो कभी मेरा अभिन्न इष्ट मित्रथा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत (12) : उनको मैं असफल लगता हूँ ॥

उनको मैं असफल लगता हूँ ॥ गमले से जो खेत हुआ मैं । उनके ही तो हेत हुआ मैं । हूँ संवेदनशील औ’ भावुक – पर उनको इक कल लगता हूँ ॥ जो बोले वो मैं कर बैठा । मरु में मीठा जल भर बैठा । व्योम निरंतर चूमूँ फिर भी – उनको पृथ्वी तल लगता हूँ ॥ उनकी ही ले सीख हुआ हूँ । इमली से यदि ईख हुआ हूँ । मदिरा से कहीं अधिक मदिर पर – उनको सादा जल लगता हूँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत ( 11 ) : एक सिंहिनी हो चुकी जो भेड़ थी ॥

एक सिंहिनी हो चुकी जो भेड़ थी ॥ खुरदुरेपन में भी सच नवनीत थी । चीख में भी पहले मृदु संगीत थी । एक पाटल पुष्प की वह पंखुड़ी – दूब कोमल अब कंटीला पेड़ थी ॥ तमतमा बैठी अचानक क्या हुआ ? मैंने उसको बस लड़कपन सा छुआ ! कह गई अक्षम्य वह अपराध था – जो ठिठोली, इक हँसी, टुक छेड़ थी ॥ मात्र जन थी अब नगर अध्यक्ष वो । वर्षों के उपरांत हुई प्रत्यक्ष वो । जब वो मिलकर चल पड़ी तो ये लगा – भेंट थी वो या कोई मुटभेड़ थी ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत (10) : फिर गये जब घूर के दिन ॥

फिर गये जब घूर के दिन ॥ चापने उसको लगे सब । चाटने उसको लगे सब । पास में आने से जिसके – कल तक आती थी जिन्हें घिन ॥ आँख का तारा हुआ है । सब का ही प्यारा हुआ है । जो न फूटी आँख भाया – था किसी को एक भी छिन ॥ भाग्य फूटा जग गया है । जैकपॉट इक लग गया है । भीख न मिलती थी जिसको – दान दे अब नोट गिन-गिन ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत ( 9 ) : देख कहाँ पर आया तू ?

देख कहाँ पर आया तू ? ओले ठण्ड के संवाहक । आग सदा ही हो दाहक । मैंने तो न कहीं देखी – शीतल अग्नि बरफ  धू-धू ॥ देख कहाँ पर आया तू ? ब्रह्मचर्य धारे नामी । सत्य-अहिंसा अनुगामी । गुपचुप यौनाचार में लिप्त – खाते माँस गटकते लहू ॥ देख कहाँ पर आया तू ? शोक-सभा में तू बतला । ऐसा भी होता है भला ? संस्मरण-रोदन पश्चात – हा-हा ,ही-ही ,हू-हू-हू ॥ देख कहाँ पर आया तू ? मुझको भी दिखला वे घर । यदि सच है तो अभी चलकर । जिनमें हिल-मिल रहती हों – माँ-बेटी सी सास-बहू ॥ देख कहाँ पर आया तू ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत ( 8 ) : ऐसी मैं कविता लिखता हूँ ॥

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ऐसी मैं कविता लिखता हूँ ॥ रोष में पर्वत को तिल कहता , हो सुरंग तो मैं बिल कहता , होता हूँ जब हर्षमग्न तो – बूँद को भी सरिता लिखता हूँ ॥ कुछ मस्तिष्क को बूझ न पड़ता , बिन ऐनक जब सूझ न पड़ता , हृष्ट-पुष्ट सम्पूर्ण पुरुष को – क्षीणकाय वनिता लिखता हूँ ॥ मित्र मंडली में जब फँसता , सुध-बुध भूल-भाल तब हँसता , कृष्ण धनी को रंक सुदामा – राधा को ललिता लिखता हूँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत (7) : सब चुप ! फिर मैं भी क्यों बोलूँ ?

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सब चुप ! फिर मैं भी क्यों बोलूँ ? सन्नाटे में बम फट जाये । गज़ भर की ज़बान कट जाये । कोई नहीं जब कुछ कहता है तो , मैं ही क्यों अपना मुँह खोलूँ ? क्यों ऐसा चाहे जब घटता है ? सोच रहे सभी ये सब क्या है ? टहलते हुए सब खा पीकर , इक मैं ही भूखा इत-उत डोलूँ ! क्वाँरे क्यों बंजर जोत रहे ? मुखड़ों पे डामल पोत रहे ? पूछ रहा है पति पत्नी से , क्या मैं तेरी सखि के सँग सोलूँ ? साथ समय के ये भागे है रे । बल्कि कहीं तो उससे आगे है रे । जैसा हुआ ये जग धावक है , मैं भी कहीं न वैसा हो लूँ ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

156 : मुक्त-ग़ज़ल - ख़त हमसे तुमको यों तो......

ख़त हमसे तुमको यों तो लिक्खे गये तमाम ॥ लेकिन न डाकिया ना कभी मिल सका हमाम ॥ दिल क्या है जान भी ये लिख दी है तेरे नाम , दिखलाएंगे किसी दिन गर आएगा मक़ाम ॥ ताउम्र तेरे ख़त की लूँगा निहार राह , मत भेजना मगर तू इन्कार का पयाम ॥ मेरी दुकाँ के कुछ यूँ वो हैं ख़रीददार , ना मुफ़्त में ही लें कुछ ना देते पूरे दाम ॥ कहते हैं वो जो करते हैं हम ख़ुशी से फ़ौर , लेकिन न मान लेना उनके हैं हम ग़ुलाम ॥ आगोश में जो बैठे बाहों में ख़ूब सोए , मतलब निकल गया तो लेते नहीं सलाम ॥ भूले से पड़ गयी थी तुम पर नज़र क्या यार , अब तुमको देखने का है आख़री मराम ॥ तन्हाइयों में अक्सर लेकर तेरा ख़याल , करते हैं आप ही से हम आप ही क़लाम ॥ ( हमाम=कबूतर ,मक़ाम=अवसर , फ़ौर=तुरंत , आख़री मराम=अंतिम इच्छा , क़लाम=बातचीत ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 653 - पड़ा रहता है...........

पड़ा रहता है दलदल में न डूबा ना धँसा करता ॥ वो मकड़ी की तरह जालों में रहकर ना फँसा करता ॥ लतीफ़ागोई करके भी मेरी आँखें भर आती हैं , वो अपनी दास्ताने ग़म सुनाकर भी हँसा करता ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत ( 6 ) : अपना अहं घटा कर देखो.......

अपना अहं घटा कर देखो ॥ तुमको भी चहुंओर दिखेगा , विरल नहीं घनघोर दिखेगा , सूखा , पीला यदि आँखों से – ऐनक हरा हटा कर देखो ॥ वह बच्चा मैला सारा है , पर अस्पृश्य नहीं प्यारा है , मात्र दृष्टि से घृणा हटा कर – छाती से लिपटा कर देखो ॥ बीच राह में आते जाते , शक्तिहीन को क्या धमकाते , जो तुमसे बलवान शत्रु हो – उसको धूल चटा कर देखो ॥ रावण को भी राम कहेगा , कंस को कृष्ण न श्याम कहेगा , वह मति मूढ़ नाम जप धुन में - शुक को राम रटा कर देखो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत ( 5 ) : मैं बारिश में गुड़ सा घुलता.....

मैं बारिश में गुड़ सा घुलता ॥ हर्षित तो किंचित रहता हूँ , प्रायः ही चिंतित रहता हूँ , जब देखो तब लेकर सिर पर – अब मुझसे यह भार न ढुलता ॥ चिंतन कर-कर देख लिया सब , मुझको यही समझ आया अब , लाभ न इसका यद्यपि कुछ पर – व्यर्थ नहीं मेरी व्याकुलता ॥ गंगा जल आसव निकला रे , देव मेरा दानव निकला रे , अब भी उस पर मरता मैं यदि – मुझ पर उसका भेद न खुलता ॥ झूठ कहें सब मैं हूँ पागल , हार न जाऊँ घिस-घिस मल-मल , सच के साबुन सच के जल से – यह कलंक झूठा न धुलता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत ( 4 ) : रह सतर्क देना वक्तव्य........

रह सतर्क देना वक्तव्य ॥ यदि निंदा भी करे तो सुन , ब्याज स्तुति के ढंग को चुन , शब्द प्राण हर सकते हैं , गाली भी बक जो हो श्रव्य ॥ हर रहस्य का पर्दा फाड़ , मुर्दा सड़ा-गला भी उखाड़ , यदि हो लाभ तो निःसन्देह – अन्यथा चुप रहना ही भव्य ॥ कह ग़ज़लें या कहानी कह , बात पुरानी-धुरानी कह , किन्तु भूर्ज पत्रों को अब – कह चिकने कागज़ अति नव्य ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत ( 3 ) : एक बार बतलाओ...........

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डर किसका था तुमको ? क्यों मुझसे पूछा न - एक बार बतलाओ ? तुम मुझपे मरते रहे , बिन पूछे करते रहे , चाँद को चकोरे सा क्यों ये प्यार बतलाओ ? सोची न युक्ति कभी , चाही न मुक्ति कभी , कैसे होता भाटा प्रेम ज्वार बतलाओ ? तुम यों ही देते रहे , बिन दाम हम लेते रहे , कैसे होगा चुकता ये उधार बतलाओ ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

नवगीत ( 2 ) : यद्यपि मैं ज्ञानी अपूर्व हूँ.........

यद्यपि मैं ज्ञानी अपूर्व हूँ ॥ वो समझें मैं वज्र मूर्ख हूँ ॥ मेरा बगुला-भगत से नाता , हर सियार मेरा लघु भ्राता , कथरी ओढ़ के पीता हूँ घी , एड़ा बनकर पेड़ा खाता , मैं जानूँ कितना मैं धूर्त हूँ  ? चक्षु खुले हैं किन्तु सुप्त मैं , वो ये सोचें स्वप्नलुप्त मैं , मैं ही जानूँ कहाँ प्रकट हूँ ? मैं ही जानूँ कहाँ गुप्त हूँ ? मैं विचित्र अदृष्ट मूर्त हूँ ॥ लकवा पीड़ित वाम हस्त है , पग दायाँ पोलियो ग्रस्त है , आँख मोतियाबिंद समर्पित , बहरेपन से कर्ण त्रस्त है , अर्ध काय पर हृदय पूर्ण हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति