*मुक्त-मुक्तक : 648 - लुत्फ़ को अपने ही........


लुत्फ़ को अपने ही हाथों से शूल करता हूँ ॥
जानकर - बूझकर ये कैसी भूल करता हूँ ?
जिसका हक़दार न हूँ क़ायदे से मैं क़ाबिल ,
उसकी दिन-रात तमन्ना फिज़ूल करता हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्त ग़ज़ल : 267 - तोप से बंदूक