*मुक्त-मुक्तक : 647 - कि कितनी मुद्दतों.........


कि कितनी मुद्दतों से अब तलक भी दम बदम अटका ॥
बढ़ा मुझ तक कहाँ जाकर तेरा पहला क़दम अटका ?
तू जैसे भी हो आ जा देखने दिल से निकल अपलक ,
तेरे दीदार को मेरी खुली आँखों में दम अटका ॥
( दम बदम=निरंतर , दीदार=दर्शन , अपलक=बिना पलक झपके ,दम=प्राण )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

Comments

Kailash Sharma said…
वाह..बहुत सुन्दर

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