*मुक्त-मुक्तक : 635 - हँसता-हँसता ये.........



हँसता-हँसता ये शाद उठता है ॥
दर्द ये नामुराद उठता है ॥
दुबका रहता है सामने सबके ,
सबके जाने के बाद उठता है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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बहुत गहरे डाक्टर साहब
धन्यवाद ! अजय कुमार झा जी !

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