*मुक्त-मुक्तक : 630 - फिर हुआ ना कुछ.......


फिर हुआ ना कुछ मुकम्मल रह गया सब अधबना ॥
जुस्तजू में ज़िंदगी की ज़िंदगी कर दी फ़ना ॥
जब फँसा दिल के गले में इश्क़ का लुक़मा मेरे ,
ना निगलते ही बना  ना तो उगलते ही बना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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