अकविता [ 6 ] : आईने.......


उनके कहे से ,
हमारी काक ध्वनि कोयल कुहुक हो जाएगी क्या ?
हमारी पिचकी-चपटी नाक नुकीली हो जाएगी क्या ?
उनके बारंबार कहते रहने से हमारा पजामा जींस नहीं हो जाएगा ।
कोई भूलकर भी
जब वह नहीं कहता
जो-जो हम सुनना चाहते हो ;
और तब हमारे पूछने से पहले ही
हमारे मन के अनुसार वे हमारे बौने क़द को हिमालय
हमारी कच्छप-चाल को चीता-गति कहते चले जाते हैं
जो
हम भली-भाँति जानते हैं कि यदि वे हमारे मातहत नहीं होते तो
हमारे खुरदुरेपन को कभी चिकनाई नहीं कह सकते थे ;
यदि हमसे भयग्रस्त नहीं होते तो
हमारी जली-भुनी रोटी को कभी भी मालपुआ नहीं कहते ।
अपनी बंदरिया को ऐसों के द्वारा सुंदरी , सुंदरी  पुकारे जाने पर
हमारा प्रसन्न होना आत्मवंचना  के सिवाय क्या है ?
ऐसे चापलूसों के बजाय
यदि हम सचमुच ही जानना चाहते हैं कि हम क्या हैं
तो
जो टुकड़े-टुकड़े होकर भी
सबकी असली सूरत का सच्चा बखान करते हैं
हमें सदैव
डटकर सामना करने की हिम्मत रखनी पड़ेगी
उन आईनों से ।  
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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