*मुक्त-मुक्तक : 626 - मेरे लिए वो ख़ुद को......


 मेरे लिए वो ख़ुद को तलबगार क्यों करे ?
नावों के होते तैर नदी पार क्यों करे ?
बिखरे हों इंतिख़ाब को जब फूल सामने ,
कोई भी हो पसंद भला ख़ार क्यों करे ?
[तलबगार=इच्छुक, इंतिख़ाब=चयन, ख़ार=काँटा]
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 


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धन्यवाद ! चतुर्वेदी जी !

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