*मुक्त-मुक्तक : 625 - मुझको बेशक़ न..........


मुझको बेशक़ न नज़र आता था मेरा साहिल ॥
चाँद , तारों सी बड़ी दूर थी मेरी मंज़िल ॥
लुत्फ़ आता था उन्हे पाने तैर चलने में,
जब तक उम्मीद थी लगता था ज़िंदगी में दिल ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्तक : 946 - फूल