Sunday, October 26, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 625 - मुझको बेशक़ न..........


मुझको बेशक़ न नज़र आता था मेरा साहिल ॥
चाँद , तारों सी बड़ी दूर थी मेरी मंज़िल ॥
लुत्फ़ आता था उन्हे पाने तैर चलने में,
जब तक उम्मीद थी लगता था ज़िंदगी में दिल ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...