*मुक्त-मुक्तक : 622 - कभी बन पाएँगे दोनों........


कभी बन पाएँगे दोनों न हमसफ़री न हमराही ॥
नहीं थोड़ा सा मुझमें और तुझमें फ़र्क है काफ़ी ॥
तेरे आगे मैं यूँ लगता कि जैसे ताड़ तू मैं तिल ,
है तू हिरनी तो मैं कछुआ, हूँ मैं बकरी तो तू हाथी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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