Monday, October 6, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 609 - इक ज़रा लुत्फ़ो-मज़ा...........


इक ज़रा लुत्फ़ो-मज़ा 
जब हों न तारी ॥
हर तरफ़ तकलीफ़ो-ग़म हों 
भारी-भारी ॥
और यही आलम हो रहना 
उम्र भर तो ,
क्यों करूँ मैं ज़िंदगी की 
पासदारी ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...