Saturday, October 4, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 607 - कम से कम में भी ज़्यादा.......


कम से कम में भी ज़्यादा लुत्फ़ उठाकर निकले ॥ 
अपने चादर से कभी पाँव न बाहर निकले ॥ 
चाँद सूरज की तमन्नाएँ न पालीं हमने ,
जुगनुओं से बख़ूबी काम चलाकर निकले ॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

1 comment:

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...