अकविता : [ 3 ] हत्या













उन से ,
आप से ,
स्वयं से ,
सब से ,
एक ही
किन्तु
कदाचित
यक्ष प्रश्न :
क्यों
अपने अवश्यंभावी नश्वर शरीर की
अंतिम साँस तक
रक्षा करते रहने के लिए
हम करते ही रहते हैं
अजर , अमर , अविनाशी
अपनी ही
आत्मा की
बारंबार
नृशंस हत्या ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (01-11-2014) को "!! शत्-शत् नमन !!" (चर्चा मंच-1784) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
Kavita Rawat said…
सुनहरा भ्रम जो है ये नश्वर संसार .....
..सब माया मोह है हमारा ..
बहुत सही बात ....
Onkar said…
सही सवाल
SAHI SWAAL ..MAUJUDA HALAT HI SHAYAD AISE HAI MARNA PADTA HAR ROJ MAN KO MAAR KAR
धन्यवाद ! sunita agarwal जी !

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