*मुक्त-मुक्तक : 604 - निपट गंजों के लिए................



चाँद से गंजों को काले 
विग घने ॥
दंतहीनों वास्ते 
डेंचर बने ॥
उड़ नहीं सकते मगर हों 
पीठ पर ,
पर शुतुरमुर्गों के शायद 
देखने ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments


बहुत सुंदर
धन्यवाद ! Lekhika 'Pari M Shlok' जी !
बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (20-09-2014) को "हम बेवफ़ा तो हरगिज न थे" (चर्चा मंच 1742) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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