*मुक्त-मुक्तक : 601 - रातें हों, दिन हों.............

रातें हों, दिन हों, शामें हों या दोपहर, सवेरे ॥
डाले रखते हैं मेरे घर मेहमाँ अक्सर डेरे ॥
रहने के अंदाज़ भी उनके बिलकुल ऐसे हैं सच ,
यूँ लगता है मैं हूँ मेहमाँ वो घर-मालिक मेरे ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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