*मुक्त-मुक्तक : 595 - अपना मजहब छोड़...........


अपना मजहब छोड़ तेरा 
अपने सर मजहब किया
रब को रब ना मानकर 
तुझको ही अपना रब किया
होश में हरगिज़ करते 
जो वो बढ़-बढ़ शौक़ से ,
हमने तेरे इश्क़ की 
दीवानगी में सब किया
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

yashoda agrawal said…
आपकी लिखी रचना शनिवार 13 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!
Rohitas ghorela said…
बहुत अच्छे डाक साब
लाजवाब मुक्तक
Rohitas ghorela said…
आप भी आईये मेरे ब्लॉग तक...अच्छा लगेगा रंगरूट

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