151 : ग़ज़ल – ज़िंदगानी तबाह.........



ज़िंदगानी तबाह कर बैठे ॥
ख़ुदकुशी का गुनाह कर बैठे ॥
हमको करना था आहआह जिधर ,
हम उधर वाहवाह कर बैठे ॥
जिसको दिल में बसा के रखना था ,
उससे टेढ़ी निगाह कर बैठे ॥
अपना उजला सफ़ेद मुस्तकबिल ,
अपने हाथों ही स्याह कर बैठे ॥
ऊबकर तीरगी से कुछ जुगनूँ ,
चाँद-सूरज की चाह कर बैठे ॥
अक़्ल मारी गई थी दुश्मन से ,
दोस्ती की सलाह कर बैठे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

Comments

बहुत लाजवाब !!
धन्यवाद ! Lekhika Pari M shlok जी !

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