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Showing posts from September, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 605 - कुछ जी भर कुछ..........

कुछ जी भर कुछ नाम मात्र को 
भोग लगाते हैं ॥ मूरख क्या ज्ञानी से ज्ञानी 
लोग लगाते हैं ॥ खुल्लमखुल्ला, लुक-छिपकर,
चाहे या अनचाहे, किन्तु सभी यौवन में प्रेम का 
रोग लगाते हैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 604 - निपट गंजों के लिए................

चाँद से गंजों को काले 
विग घने ॥ दंतहीनों वास्ते 
डेंचर बने ॥ उड़ नहीं सकते मगर हों 
पीठ पर , पर शुतुरमुर्गों के शायद 
देखने ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 603 - बेझिझक बाहों में ले........

बेझिझकबाहोंमेंले
मुझकोजकड़नाक्याहुआ? सारीदुनियासेमेरी
ख़ातिरझगड़नाक्याहुआ? मेरीछोटीसीख़ुशीके
वास्तेलंबीदुआ, पीरकीचौखटपेवो
माथा

*मुक्त-मुक्तक : 602 - दिल के बाशिंदों से..............

दिलकेबाशिंदोंसेमुँह
मोड़आये जानेकिस-किसकेदिलको
तोड़आये? जुड़केरहनेकाजिनसे
वादाथा, उनसेहरएकरिश्ता
तोड़आये -डॉ. हीरालालप्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 601 - रातें हों, दिन हों.............

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रातें हों, दिन हों, शामें हों या दोपहर, सवेरे ॥ डाले रखते हैं मेरे घर मेहमाँ अक्सर डेरे ॥ रहने के अंदाज़ भी उनके बिलकुल ऐसे हैं सच , यूँ लगता है मैं हूँ मेहमाँ वो घर-मालिक मेरे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 600 - छः को छः.........

छःकोछः,सत्तेकोबोले
सातवह दिनकोदिन,रातोंकोबोले
रातवह कैसेमानूँहैनशेमें
धुत्तफिर, कररहाजबहोशकीहर
बात

*मुक्त-मुक्तक : 599 - मुँह से ज़रा सी रोशनी.........

मुँह से ज़रा सी रोशनी की 
बात थी निकली ॥ उसने गिरा दी हम पे 
कड़कड़ाती ही बिजली ॥ झोली में गिद्ध, चील, बाज 
झट से ला पटके , चाही जो हमने इक ज़रा-सी 
प्यारी-सी तितली ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 598 - कहा करते हैं लो..............

कहा करते हैं लो इस हाथ उस से 
दो मोहब्बत ॥ हक़ीक़त में मगर जाने न क्या ये 
हो मोहब्बत ॥ नफ़ा-नुकसान का करके ख़याल अब 
के जहाँ में , तिजारत की तरह करते हैं लोग 
इश्क़ो-मोहब्बत ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 597 - यहाँ क्या और वहाँ क्या.............

यहाँ क्या और वहाँ क्या 
हर जगह पर याद आता है ॥ नहीं रुक - रुक के वो मुझको 
निरंतर याद आता है ॥ रहा करते थे जब उसमें 
तब उसकी क़द्र न जानी , कि घर से दूर होकर अब 
बहुत घर याद आता है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 596 - उनसे मिलने मैं............

उनसे मिलने मैं ख़ुद से 
छूट-छूट जाता हूँ ॥ उनसे जुड़ने को अपने 
आप टूट जाता हूँ ॥ मुझसे सचमुच में वो जो 
रूठ जाएँ तो उनसे , मैं मनाने को झूठ-
मूठ रूठ जाता हूँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 595 - अपना मजहब छोड़...........

अपनामजहबछोड़तेरा
अपनेसरमजहबकिया रबकोरबनामानकर
तुझकोहीअपनारबकिया होशमेंहरगिज़करते
जोवोबढ़-बढ़

151 : ग़ज़ल – ज़िंदगानी तबाह.........

ज़िंदगानी तबाह कर बैठे ॥ ख़ुदकुशी का गुनाह कर बैठे ॥ हमको करना था आह–आह जिधर, हम उधर वाह–वाह कर बैठे ॥ जिसको दिल में बसा के रखना था, उससे टेढ़ी निगाह कर बैठे ॥ अपना उजला सफ़ेद मुस्तकबिल, अपने हाथों ही स्याह कर बैठे ॥ ऊबकर तीरगी से कुछ जुगनूँ, चाँद-सूरज की चाह कर बैठे ॥ अक़्ल मारी गई थी दुश्मन से, दोस्ती की सलाह कर बैठे ॥