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Showing posts from August, 2014

मुक्तक : 594 - इक सिवा उसके कहीं........

इक सिवा उसके कहीं दिल 
आ नहीं सकता ॥ है ये पागलपन मगर अब 
जा नहीं सकता ॥ क्या करूँ मज्बूर हूँ अपनी तमन्ना से ? फिर भी तो चाहूँ उसे जो 
पा नहीं सकता ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

150 : ग़ज़ल - दोस्त कब सौ हज़ार.........

दोस्त कब सौ हज़ार करना है ? इक दो बस ग़म गुसार करना है ॥ जिनसे नज़रें मिलाना हो मुश्किल , उनसे आँखों को चार करना है ॥ इस ज़माने में बस मोहब्बत के , और सब कुछ उधार करना है ॥ सब कहें प्यार और वो भी हम , अब तो हमको भी प्यार करना है ॥ ख़ुद को चाहे न हम सुधार सकें , दूसरों का सुधार करना है ॥ एक सुख का किनारा पाने को , कितने दुक्खों को पार करना है ॥ ज़िंदगी को चलाए रखने को , कोई तो रोज़गार करना है ॥ बाद मरने के भी रहें ज़िंदा , काम कुछ यादगार करना है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति