*मुक्त-मुक्तक : 591 - घूँट दो घूँट भरते भरते..........


घूँट दो घूँट भरते भरते फिर 
पूरा भर भर रिकाब पीने लगे ॥
आबे ज़मज़म के पीने वाले हम 
धीरे धीरे शराब पीने लगे ॥
दर्दो तक्लीफ़ के पियक्कड़ थे 
पर तेरा हिज्रे ग़म न झेल सके ,
पहले पीते थे बाँधकर हद को 
बाद को बेहिसाब पीने लगे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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