*मुक्त-मुक्तक : 590 – मुझपे ज़ाहिर न कभी......


मुझपे ज़ाहिर न कभी 
क्यों ये अपनी ख़्वाहिश की ?
हक़ से क्यों हुक़्म सुनाया 
न क्यों गुज़ारिश की ?
क्यों मेरी जान माँगने में 
शर्म आयी तुझे ?
क़त्ल की क्यों ऐ मेरी जान 
तूने साज़िश की ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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