*मुक्त-मुक्तक : 589 - लिए उड़ानों की हसरतें......


लिए उड़ानों की हसरतें 
जंगलों में पैदल सफर करें ॥ 

हुकूमतों की लिए तमन्ना 
गुलामियों में बसर करें ॥ 
न जाने खुद की खताएँ हैं या 
नसीब की चालबाज़ियाँ ,
कि हम तमन्नाई क़हक़हों के 
हमेशा रोना मगर करें ॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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