*मुक्त-मुक्तक : 582 - शायद लगेगी तुमको..............


शायद लगेगी तुमको मेरी ख़्वाहिश अजब है ॥
मानो न मानो मुझको सच मगर ये तलब है ॥
कर दूँ तमाम काम ग़रीबों के मुफ़्त पर ,
गुर्बत मेरी ही मुझसे चिपकी छूटती कब है ?
( गुर्बत=दरिद्रता,कंगाली )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Pratibha Verma said…
बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
धन्यवाद ! Pratibha Verma जी !

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