मुक्त-मुक्तक : 577 - ताबूत एक पुख्ता.........


ताबूत एक पुख्ता इक शानदार तुर्बत ॥
इक क़ीमती कफ़न कुछ कंधे उठाने मैयत ॥
कब से जुटा रखा है अपनों ने साजो-सामाँ ,
मैं ख़ुद भी मुंतज़िर हूँ कब आये वक़्त-ए-रुख़सत ॥
[तुर्बत=समाधि , क़ब्र   /  मुंतज़िर=प्रतीक्षारत ]
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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