मुक्त-मुक्तक : 572 - पर्वत होकर चलना........

पर्वत होकर चलना चाहूँ ॥
पानी बनकर जलना चाहूँ ॥
है अजीब , नामुमकिन लेकिन ,
बिन पिघले ही ढलना चाहूँ ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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