मुक्त-मुक्तक : 571 - पाऊँ न आस्माँ.........


पाऊँ न आस्माँ 
बुलंदियाँ तो छुऊँगा ॥
ताक़त को अपनी सब 
समेट कर के उड़ूँगा ॥
मुर्ग़ा हूँ अपने पंख 
देखकर ही ख़ुश रहूँ ,
उनके लिए मगर मैं 
एक बाज बनूँगा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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