139 : मुक्त-ग़ज़ल - यों रास्ते में हाथों........

यों रास्ते में हाथों के दान छिन गए रे ॥
देने चले थे उल्टा लेकर के रिन गए रे ॥
गंदी पवित्रता में दो डुबकियाँ लगाकर ,
मन-आत्म से हो पावन तन से मलिन गए रे ॥
गर्मी ने आस्माँ से बरसाई आग दिल से ,
बारिश के दिन बेचारे बूँदों के बिन गए रे ॥
थी नींद दूर कोसों और रात घंटों लंबी ,
हम जितने भी थे इक-इक सब तारे गिन गए रे ॥
दुश्मन पे ख़ैर कोई करता नहीं मगर अब ,
अपनों पे भी भरोसा करने के दिन गए रे ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (06-07-2014) को "मैं भी जागा, तुम भी जागो" {चर्चामंच - 1666} पर भी होगी।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद ! मयंक जी !

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