मुक्त-मुक्तक : 565 - धुर-धधकती गर्मियों में.........

धुर-धधकती गर्मियों में बर्फ़ के टुकड़े सी वो ॥
कड़कड़ाती सर्दियों में ऊन के कपड़े सी वो ॥
पहले साँसों की तरह आती थी जाती थी मगर ,
अब नहीं मिलती है ढूँढे कुम्भ के बिछड़े सी वो ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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