145 : मुक्त-ग़ज़ल - बताशे ख़ुद को या........


बताशे ख़ुद को या मिट्टी के ढेले मान लेते हैं ॥
ज़रा सी बारिशों में लोग छाते तान लेते हैं ॥
कई होते हैं जो अक्सर ज़माने को दिखाने को ,
नहीं बनना है जो बनने की वो ही ठान लेते हैं ॥
मुसाफ़िर राह में कितनी ही बार आराम फ़रमाते ,
कुछ ही मंजिल पहुँचकर भी न इत्मीनान लेते हैं ॥
कई देखे हैं जो लेते नहीं *इमदाद छोटी भी ,
वही खुद्दार मौक़े पर बड़े अहसान लेते हैं ॥
*दियानतदार-ओ-दींदार सच्चे , दुश्मनों का भी
कभी न भूलकर भी दीन-ओ-ईमान लेते हैं ॥
(*इमदाद=सहयोग *दियानतदार=सत्यनिष्ठ *दींदार=धर्मनिष्ठ )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

धन्यवाद ! मयंक जी !
Kailash Sharma said…
बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति...
धन्यवाद ! Kailash Sharma जी !

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