144 : मुक्त ग़ज़ल - वैसे मैं इक मेला हूँ


वैसे मैं इक मेला हूँ ॥
लेकिन आज अकेला हूँ ॥
ऊपर से जितना हड्डी ,
अंदर उतना केला हूँ ॥
वो चट्टान है सोने की ,
मैं मिट्टी का ढेला हूँ ॥
मुझसे झूठ न बुलवाओ ,
हरिश्चंद्र का चेला हूँ ॥
दोपहरी की आँच नहीं ,
अब मैं साँझ की बेला हूँ ॥
इतना जीत को मत झगड़ो ,
युद्ध नहीं मैं खेला हूँ ॥
मुझको कौन सहेज रखे ?
गिन्नी नहीं हूँ धेला हूँ ॥
तुम कागज़ की नाव बड़ी ,
मैं पानी का रेला हूँ ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
धन्यवाद ! Lekhika 'Pari M Shlok' जी !

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