143 : मुक्त-ग़ज़ल - उसको पाने को न कल......


उसको पाने को न कल जी-जान से अड़ता ॥
ज़िंदगी का आज पड़ता ही नहीं पड़ता ॥
या तो पक जाता है या फिर रोग से वरना ,
शाख़ से पत्ता हरा यों ही नहीं झड़ता ॥
कुछ न कुछ टकराव के हालात होते हैं ,
हर किसी से कोई यों ही तो नहीं लड़ता ॥
भीम के भी हाथ से दीवार में कीला ,
बिन हथौड़े के गड़ाये से नहीं गड़ता ॥
टाट में पैबंद मख़मल का लगाओ मत ,
कोई भी लोहे में हीरे को नहीं जड़ता ॥
कितना भी लोहा खरा हो रात-दिन लेकिन ,
बरसों तक पानी में रहकर सड़ता ही सड़ता ॥
एक सुर पर्वत को नाटा कहते रहने से ,
बौने टीलों का कभी भी क़द नहीं बढ़ता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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