142 : मुक्त-ग़ज़ल - रहमदिल को बना देता है...


रहमदिल को बना देता है इक जल्लाद सा लोगों ॥
बदल देता है सारी ज़िन्दगी इक हादसा लोगों ॥
लतीफ़े की तरह लगता है बेशक़ वो मगर सुनिए ,
हक़ीक़त में है वो लबरेज़े-ग़म रूदाद* सा लोगों ॥
उन्हे वह देखते ही रूह तक जल-भुन के आता है ,
बहुत झुक-झुक के इस्तक़बाल* करने , शाद सा लोगों ॥
जनाज़े में तुम आए हो अदू के तो भी तो रस्मन ,
करो चेहरों को ग़मगीं मत रखो दिलशाद सा लोगों ॥
न जाने क्यूँ मगर ये आजकल महसूस होता है ,
वतन मेरा अभी पूरा नहीं आज़ाद सा लोगों ?
(*लबरेज़े-ग़म रूदाद=दुखपूर्ण कहानी *अदू=शत्रु  *इस्तक़बाल=स्वागत *शाद=प्रसन्न )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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