138 : मुक्त-ग़ज़ल - अपने आँसू कहीं..........


अपने आँसू कहीं छुपा दूँगा ॥
वो जब आएँगे मुस्कुरा दूँगा ॥
हाल होते हैं पूछने भर को ,
ठीक है ठीक हूँ बता दूँगा ॥
उनकी रातों की रोशनी खातिर ,
अपने घर को दिया बना दूँगा ॥
करलें शक़ मुझपे कुछ छिपाने का ,
ख़ाक मुट्ठी की कल दिखा दूँगा ॥
तूने क्यों ख़ुदकुशी की ज़ुर्रत की ?
तुझको जीने की मैं सज़ा दूँगा ॥
इन लतीफ़ों को क्या सज़ा दूँ मैं ?
सुन के आँखों को डबडबा दूँगा ॥
बेवफ़ा हैं वो कैसे उनको मैं ,
फूलने फलने की दुआ दूँगा ॥
बोझ अपना न उठ सका जिस दिन ,
ख़ुद को दुनिया से ही उठा दूँगा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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