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Showing posts from July, 2014

मुक्तक : 593 - यूँ ही सी नहीं कोई.............

यूँ ही सी नहीं कोई 
मुसीबत से सामना ॥ करता हूँ नई रोज़ 
अजीयत से सामना ॥ यूँ भी न समझ दर्द 
उठाता हूँ हो खफ़ा , करता हूँ तह-ए-दिल से ,
बीअत से सामना ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 592 - इक बार हमने सचमुच..........

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इक बार हमने सचमुच 
इतनी शराब पी थी ॥ इक घूँट में दो प्यालों 
जितनी शराब पी थी ॥ यारों का दोस्ती की 
सर पर क़सम था धरना , फिर होश न रहा कुछ 
कितनी शराब पी थी ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 591 - घूँट दो घूँट भरते भरते..........

घूँट दो घूँट भरते भरते फिर 
पूरा भर भर रिकाब पीने लगे ॥ आबे ज़मज़म के पीने वाले हम 
धीरे धीरे शराब पीने लगे ॥ दर्दो तक्लीफ़ के पियक्कड़ थे 
पर तेरा हिज्रे ग़म न झेल सके , पहले पीते थे बाँधकर हद को 
बाद को बेहिसाब पीने लगे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

149 : ग़ज़ल - मुझे ग़म देने वाले.................

मुझे ग़म देने वाले अब ख़ुशी तुम भी न पाओगे ॥ मुझे यूँ मारकर तुम भी ज़ियादा जी न पाओगे ॥ किसी की तड़पनों की दिल्लगी तुमने उड़ाई है , मगर हर दिल्लगी इतनी कभी सस्ती न पाओगे ॥ दिलों को तोड़ने का खेल अब तुम बंद भी कर दो , किसी की आह लेकर हर घड़ी मस्ती न पाओगे ॥ मेहरबाँ वक़्त है उड़ लो खफ़ा हो जाए फिर क्या हो , तरस जाओगे चलने को कहीं धरती न पाओगे ॥ मैं कर दूँगा तुम्हें मजबूर जीने के लिए इतना , कि मारना चाहकर भी जह्र को तुम पी न पाओगे ॥ ये माना शहर बेहद ख़ूबसूरत है तुम्हारा ये , मगर बेशक़ हमारे जैसी भी बस्ती न पाओगे ॥ सिला यूँ ही बुरा मिलता रहा अच्छाइयों का गर , यक़ीनन हममें आइंदा तुम अच्छाई न पाओगे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

148 : ग़ज़ल - उसका जीवन...........

उसका जीवन सुधर गया होता ॥ मरने से कुछ ठहर गया होता ॥ तैरना जानता तो बिन कश्ती _ और पर बिन भी तर गया होता ॥ मुझसे वो बोलते तो मुश्किल क्या , ग़ैर मुमकिन भी कर गया होता ॥ ज़िंदगी से न तंग होता तो , मौत से मैं भी डर गया होता ॥ मैं भी परदेश से दिवाली पर , काश ! होता तो घर गया होता ॥ पोल उसकी न खुल गई होती , क्यों वो दिल से उतर गया होता ? तह में सूराख़ उस घड़े की था , वरना बारिश में भर गया होता ॥ ब्रह्मचारी था वरना वो तुझपे , तुझको तकते ही मर गया होता ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

147 : मुक्त-ग़ज़ल - ग़ज़लों में आँसू.........

ग़ज़लों में आँसू बोता हूँ ॥ लेकिन तुझको ना रोता हूँ ॥ तेरी भारी भरकम यादें , फूल सरीखा मैं ढोता हूँ ॥ तू है राम-नाम सा मुझको , मैं तेरा रट्टू तोता हूँ ॥ एक तेरा क्या हो बैठा मैं , और किसी का कब होता हूँ ? नींद नहीं आती है मुझको , सोने को बेशक़ सोता हूँ ॥ तू मुझमें गुम-गुम जाता है , मैं तुझमें ख़ुद को खोता हूँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 590 – मुझपे ज़ाहिर न कभी......

मुझपे ज़ाहिर न कभी 
क्यों ये अपनी ख़्वाहिश की ? हक़ से क्यों हुक़्म सुनाया 
न क्यों गुज़ारिश की ? क्यों मेरी जान माँगने में 
शर्म आयी तुझे ? क़त्ल की क्यों ऐ मेरी जान 
तूने साज़िश की ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 589 - लिए उड़ानों की हसरतें......

लिए उड़ानों की हसरतें 
जंगलों में पैदल सफर करें ॥
हुकूमतों की लिए तमन्ना 
गुलामियों में बसर करें ॥ न जाने खुद की खताएँ हैं या 
नसीब की चालबाज़ियाँ ,
कि हम तमन्नाई क़हक़हों के 
हमेशा रोना मगर करें ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

146 : मुक्त-ग़ज़ल - इतना *जिगर फ़िगार........

इतना *जिगर फ़िगार हूँ ॥ रोता मैं ज़ार-ज़ार हूँ ॥ तड़पे न वो मुझे मगर , मैं उसको बेक़रार हूँ ॥ वो बुझती शमअ है तो क्या ? मैं ज़िंदा इक शरार हूँ ॥ अहमक़ बनूँ मैं जानकर , वैसे मैं होशियार हूँ ॥ हूँ दोस्त को तो गुल मगर , दुश्मन को भी न ख़ार हूँ ॥ उसके लिए मैं सिर्फ़ इक , सीढ़ी या रहगुज़ार हूँ ॥ नज़रों से गिर गया तो क्या ? दिल में अभी शुमार हूँ ॥  दिखता नहीं तो उसको ये – लगता कि मैं फ़रार हूँ ॥ बस मक़्बरा वो ताज सा , मैं पीर की मज़ार हूँ ॥ ज़ख़्मी *उक़ाब हूँ तो क्या – मैं साँप का शिकार हूँ ? ( *जिगर फ़िगार=भग्न हृदय * उक़ा =गरुड़ ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 588 - बस उछल-कूद और........

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बस उछल-कूद और गंदे नाच गाने ॥ हर तरफ़ बेखौफ़ बढ़ते नंगियाने ॥ कौन सी तहज़ीब का ये दौर आया , कहाँ ले जा रहा कोई न जाने ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 587 - दिन को कह दे रात.......

दिन को कह दे रात 
कोई रात लगती है ॥ सूखे को बरसात तो 
बरसात लगती है ॥ हमको जो सुनना अगर 
कह दे वही कोई , झूठ भी हो वो तो सच्ची 
बात लगती है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 586 - ज़िन्दगी यूँ ही ग़मे......

ज़िन्दगी यूँ ही ग़मे 
गेती की मारी है ॥ जिस्म भी तक्लीफ़ से 
हल्कान भारी है ॥ डॉक्टर ख़ुद जह्र देना
 चाहे उसको पर , उसपे भी क़ानून की 
तलवार तारी है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 585 - मुझे तो तेरी तबीयत.........

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मुझे तो तेरी तबीयत ख़राब लगती है ॥ मेरी दवा है जो तुझको शराब लगती है ॥ हलक़ उतरते ही जब ये दिमाग़ पर चढ़ती , हयाते ख़ार भी गुलगुलाब लगती है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 584 - हैरतो ताज्जुब ! गजब........

हैरतो ताज्जुब ! गजब 
दोनों की क़िस्मत है ॥ वरना जादू या करिश्मा 
या करामत है ॥ नोक पे काँटों की फूला 
झूमे गुब्बारा , पत्थरी बारिश में 
आईना सलामत है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

145 : मुक्त-ग़ज़ल - बताशे ख़ुद को या........

बताशे ख़ुद को या मिट्टी के ढेले मान लेते हैं ॥ ज़रा सी बारिशों में लोग छाते तान लेते हैं ॥ कई होते हैं जो अक्सर ज़माने को दिखाने को , नहीं बनना है जो बनने की वो ही ठान लेते हैं ॥ मुसाफ़िर राह में कितनी ही बार आराम फ़रमाते , कुछ ही मंजिल पहुँचकर भी न इत्मीनान लेते हैं ॥ कई देखे हैं जो लेते नहीं *इमदाद छोटी भी , वही खुद्दार मौक़े पर बड़े अहसान लेते हैं ॥ *दियानतदार-ओ-दींदार सच्चे , दुश्मनों का भी कभी न भूलकर भी दीन-ओ-ईमान लेते हैं ॥ (*इमदाद=सहयोग *दियानतदार=सत्यनिष्ठ *दींदार=धर्मनिष्ठ ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 583 - हे शिव जो जग में है...

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हे शिव जो जग में है अशिव तुरत निवार दो ॥ परिव्याप्त मलिन तत्व गंग से निखार दो ॥ स्वर्गिक बना दो पूर्वकाल सी धरा पुनः , या खोल अपना तीसरा नयन निहार दो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 582 - शायद लगेगी तुमको..............

शायद लगेगी तुमको मेरी ख़्वाहिश अजब है ॥ मानो न मानो मुझको सच मगर ये तलब है ॥ कर दूँ तमाम काम ग़रीबों के मुफ़्त पर , गुर्बत मेरी ही मुझसे चिपकी छूटती कब है ? ( गुर्बत=दरिद्रता,कंगाली ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 581 - याँ मुफ़्त वाँ नक़द.....

याँ मुफ़्त वाँ नक़द 
कहीं बग़ैर ब्याज उधार ॥ महँगी कहीं कहीं पे 
सस्ती चीज़ें बेशुमार ॥ मुँह माँगी क़ीमतें लिए 
फिरे हम हाथ में , पाया नहीं कहीं जहाँ में 
प्यार का बजार ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 580 - आर्ज़ू रखता नहीं.......

आर्ज़ू रखता नहीं कुछ ख़्वाब भी बुनता नहीं ॥ बाग़ के काँटे निकालूँ गुल-कली चुनता नहीं ॥ *ख़ुशमनिश हूँ मैं *मुरीदे-मर्सिया *हैरानगी , *शादमानी में भी *नग्मा–ए–ख़ुशी सुनता नहीं ॥ ( *ख़ुशमनिश=प्रसन्नचित्त व्यक्ति  *मुरीदे-मर्सिया=शोकगीत प्रेमी *हैरानगी=आश्चर्य *शादमानी=प्रसन्नता का अवसर  *नग्माख़ुशी=हर्षगीत ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

144 : मुक्त ग़ज़ल - वैसे मैं इक मेला हूँ

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वैसे मैं इक मेला हूँ ॥ लेकिन आज अकेला हूँ ॥ ऊपर से जितना हड्डी , अंदर उतना केला हूँ ॥ वो चट्टान है सोने की , मैं मिट्टी का ढेला हूँ ॥ मुझसे झूठ न बुलवाओ , हरिश्चंद्र का चेला हूँ ॥ दोपहरी की आँच नहीं , अब मैं साँझ की बेला हूँ ॥ इतना जीत को मत झगड़ो , युद्ध नहीं मैं खेला हूँ ॥ मुझको कौन सहेज रखे ? गिन्नी नहीं हूँ धेला हूँ ॥ तुम कागज़ की नाव बड़ी , मैं पानी का रेला हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्त-मुक्तक : 579 - बहुत से लोग पेंगें..........

बहुत से लोग पेंगें 
मारने लगते हैं झूलों में ॥ कुछ इक जाकर उछलने-
कूदने लगते हैं फूलों में ॥ समंदर हम से ग़म के 
बूँद भी पाकर ख़ुशी की सच , लगाने लोट लगते हैं 
गधों की तरह धूलों में ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

143 : मुक्त-ग़ज़ल - उसको पाने को न कल......

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उसको पाने को न कल जी-जान से अड़ता ॥ ज़िंदगी का आज पड़ता ही नहीं पड़ता ॥ या तो पक जाता है या फिर रोग से वरना , शाख़ से पत्ता हरा यों ही नहीं झड़ता ॥ कुछ न कुछ टकराव के हालात होते हैं , हर किसी से कोई यों ही तो नहीं लड़ता ॥ भीम के भी हाथ से दीवार में कीला , बिन हथौड़े के गड़ाये से नहीं गड़ता ॥ टाट में पैबंद मख़मल का लगाओ मत , कोई भी लोहे में हीरे को नहीं जड़ता ॥ कितना भी लोहा खरा हो रात-दिन लेकिन , बरसों तक पानी में रहकर सड़ता ही सड़ता ॥ एक सुर पर्वत को नाटा कहते रहने से , बौने टीलों का कभी भी क़द नहीं बढ़ता ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

142 : मुक्त-ग़ज़ल - रहमदिल को बना देता है...

रहमदिल को बना देता है इक जल्लाद सा लोगों ॥ बदल देता है सारी ज़िन्दगी इक हादसा लोगों ॥ लतीफ़े की तरह लगता है बेशक़ वो मगर सुनिए , हक़ीक़त में है वो लबरेज़े-ग़म रूदाद* सा लोगों ॥ उन्हे वह देखते ही रूह तक जल-भुन के आता है , बहुत झुक-झुक के इस्तक़बाल* करने , शाद सा लोगों ॥ जनाज़े में तुम आए हो अदू के तो भी तो रस्मन , करो चेहरों को ग़मगीं मत रखो दिलशाद सा लोगों ॥ न जाने क्यूँ मगर ये आजकल महसूस होता है , वतन मेरा अभी पूरा नहीं आज़ाद सा लोगों ? (*लबरेज़े-ग़म रूदाद=दुखपूर्ण कहानी *अदू=शत्रु  *इस्तक़बाल=स्वागत *शाद=प्रसन्न ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

141 : मुक्त-ग़ज़ल - गर्मी में अब्र की कब........

गर्मी में अब्र की कब ख़ैरात माँगता हूँ ? बारिश के मौसमों में बरसात माँगता हूँ ॥ तंग आ चुका घिसटते उड़ने को पंख कब मैं , चलने के वास्ते बस दो लात माँगता हूँ ॥ हैं पास तेरे नौ-दस एकाध मुझको दे दे , कब तुझसे रोटियाँ मैं छः सात माँगता हूँ ? हक़ की करूँ गुजारिश, हक़ के लिए लड़ूँ मैं , कब भीख की तलब ? कब सौग़ात माँगता हूँ ? उम्मीदे-ख़ैरमक़्दम ग़ैरों से कब मैं रक्खूँ ? अपनों में बस ज़रा सी औक़ात माँगता हूँ ॥ [ अब्र=बादल........ख़ैरमक़्दम=स्वागत-सत्कार ] -डॉ. हीरालाल प्रजापति