*मुक्त-मुक्तक : 547 - तक्लीफ़ पे तक्लीफ़...........


तक्लीफ़ पे तक्लीफ़ 
दर्द _दर्द पे दिया ॥
जो भी दिया था तुमने 
हाथों हाथ उसे लिया ॥
तुम जैसा न शौक़ीन-ए-ग़म 
कि दिल ही दिल में रो ,
हँस हँस के सितम झेले 
सब कभी न उफ़ किया ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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धन्यवाद ! सुशील कुमार जोशी जी !

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