*मुक्त-मुक्तक : 540 - क़ुदरत ने तो बख़्शा था................


क़ुदरत ने तो बख़्शा था हुस्न ख़ूब-लाजवाब ॥
जंगल घने थे झीलें लबालब नदी पुरआब ॥  
किसने ज़मीन उजाड़ी है पेड़ों को काट-काट ?
हम ही ने सूरत इसकी बिगाड़ी है की ख़राब ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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