135 : मुक्त-ग़ज़ल - यूँ ही सा देखने में है..............


यूँ ही सा देखने में है वो छोटा सा बड़ा इंसाँ ॥
सभी को बैठने कहता है ख़ुद रहकर खड़ा इंसाँ ॥
जहाँ सब लोग उखड़ जाते हैं पत्ते-डाल से , जड़ से ,
वो टस से मस नहीं होता पहाड़ों सा अड़ा इंसाँ ॥
वो अंदर से है मक्खन से मुलायम आज़मा लेना ,
यों दिखता है वो ऊपर नारियल जैसा कड़ा इंसाँ ॥
नहीं मिलता कहीं दो घूँट जब पानी मरुस्थल में ,
वहाँ ले आ पहुँचता है वो पानी का घड़ा इंसाँ ॥
जो सोता बेचकर घोड़े वो उठ जाता है बाँगों से ,
नहीं उठता है आँखें खोलकर लेटा , पड़ा इंसाँ ॥
यों जुड़ता है किसी से जैसे उसका ही वो टुकड़ा हो ,
क़रीने से अँगूठी में नगीने सा जड़ा इंसाँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (14-06-2014) को "इंतज़ार का ज़ायका" (चर्चा मंच-1643) पर भी होगी!
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
Onkar said…
बहुत सुंदर
सदा said…
अनुपम .....
Vaanbhatt said…
सुन्दर रचना...

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्त ग़ज़ल : 267 - तोप से बंदूक