*मुक्त-मुक्तक 537 - ताउम्र कराहों की न ................


ताउम्र कराहों की न 
आहों की सज़ा दो ॥
मत एक भूल पर सौ 
गुनाहों की सज़ा दो ॥
जूतों को छीन-फाड़ दो 
टाँगें तो न काटो ,
चाहो तो बबूलों भरी 
राहों की सज़ा दो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (08-06-2014) को ""मृगतृष्णा" (चर्चा मंच-1637) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
धन्यवाद ! मयंक जी !
Vinay Prajapati said…
वाह जी वा!

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