*मुक्त-मुक्तक : 533 - ठंडे बुझे पलीतों को..............



ठंडे बुझे पलीतों को
 
गाज़ बनते देखा ॥
कल तक तो चंद बहुतों 
को आज बनते देखा ॥
दुनिया में अब बचा क्या है 
कुछ भी ग़ैरमुमकिन  ?
जूता घिसा-फटा भी 
सरताज बनते देखा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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